गुरुवार, 20 जुलाई 2017

हथकड़ी कल जो लगी....आज कंगन कैसे -

कल के युग गीत मधुर
आज क्रंदन कैसे
हथकड़ी हाथ का बंधन
आज कंगन कैसे -

कल का विषबेल तरु
आज चंदन कैसे
कल का द्रोही तेरे विचारों में
आज वंदन कैसे-

कहा था पापी संस्कार रहित
आज मंडन कैसे
अक्षम्य अपराध था जिनका
आज अभिनंदन कैसे-

कल जो रेत था नयनों में
आज अंजन कैसे
कल पीतल तुम्हें नजर आया
आज कुन्दन कैसे-

उदय वीर सिंह


हथकड़ी कल जो लगी आज कंगन कैसे

कल के युग गीत मधुर
आज क्रंदन कैसे
हथकड़ी कल जो लगी
आज कंगन कैसे -
कल का द्रोही तेरे विचारों में
आज वंदन कैसे
कहा पतित संस्कार रहित
आज मंडन कैसे -
अक्षम्य था अपराध उदय
आज अभिनंदन कैसे
कल नयन में रेत सी लगती
आज अंजन कैसे
कल जो पावन थी गंगा की तरह
आज लांछन कैसे
उदय वीर सिंह




जो कल थी फौलादी बेड़ी

जो पुछते थे सवाल कल 
आज वो सवाल तुमसे है 
जिसका था तुम्हें मलाल कल 
आज वो मलाल तुमसे है 
जो कल थी फौलादी बेड़ी
आज कनक कंगन हुई 
कल झटके की बात करते थे 
आज जिंदगी हलाल तुमसे है 
सँपेरों मदारियों का था ये देश
है ऐसा तुम्हारा खयाल 
पाणिनी आर्यभट्ट बराहमिहिर .
का प्रश्न  प्रहार तुमसे है -
रोटी कपड़ा मकान का रोना
सुरक्षा संस्कृति का विलाप भी 
आज सुरक्षा संस्कृति रोटी कपड़ा 
मकान का सवाल तुमसे है -
खाईं बढ़ रही है समाज में 
तुम्हारी असहनीय चिंता थी 
आज खाईं ही नहीं नफरत की 
उठी दीवाल का सवाल तुमसे है -

उदय सिंह 

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

मेरे वीर !

मेरे वीर !
आँसू देकर क्यों रोता है 
मैंने बोये शूल तेरे पथ 
प्रसून मुझे  तूँ क्यो बोता है 
हमने रोकी राह तुम्हारी 
हमने पुछे प्रश्न सतत 
पीर तुम्हारी  संग न था 
दर्द हमारे क्यों ढोता है 
निशा हमारी तमस हमारा 
झंझावात हमारे हैं 
पथ पथरीले नियति हमारी 
पथ दीपक क्यों सँजोता है -
उदय वीर सिंह 

शनिवार, 15 जुलाई 2017

यहाँ देशद्रोही भी जवान के समतुल्य होता है -

वहाँ सरहद पर वीर जवान शहीद होता है ,
यहाँ वलिदान का मान नहीं मूल्य लगता है -
प्रश्न करते हैं कि गोली सिने या पीठ पर लगी 
यहाँ देशद्रोही भी जवान के समतुल्य होता है -
संगठन रोते हैं बुहे फाड़ धर्म-जाति के नाम पर 
बताओ शहीद परिवारों के साथ खड़ा कौन होता है......  

 उदय वीर सिंह

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

उनहों ने राजनीति शास्त्र पढ़ा मैं कृषि विज्ञान

उनहों ने राजनीति शास्त्र पढ़ा मैं कृषि विज्ञान
वो सरकार हो गए मैं कर्जदार हो गया -
उनहों ने किया भ्रष्टाचार मैंने वाणिज्य व्यापार
वो वो सेहतमंद हो गए मैं बीमार हो गया -
करते रहे सौदा वतन का वतनपरस्त बने रहे
मैं करके वतन की हिफाजत गद्दार हो गया -
डरे घड़ियाल भी उनके रोने से सैलाब आता है
उन्हे सर्दी लगी तीमारदार सारा अखबार हो गया -
उदय वीर सिंह



बुधवार, 12 जुलाई 2017

उन्माद की आँधी क्यों चली

सोच तो है पर संकोच क्यों है 
वीर कातिल भी  निर्दोष क्यों है -
उन्माद की आँधी क्यों चली 
मासूम दिलों में असंतोष क्यों है -
इल्म का दर भी कातिलाना है 
मुर्दा भी सरफरोश क्यों है
जो वतन का है इंसानियत का 
मरने पर अफ़सोस क्यों है -
उदय वीर सिंह


बुधवार, 5 जुलाई 2017

भींग आए मन तो निथार लेना

भींग आए मन तो निथार लेना
गए पाँव लौट आएँ तो पखार लेना
आँखें नीची किए गया मुड़कर देखा
वो निश्छल प्रेम था पुकार लेना -
उलझ ही जाती हैं लटें आदतन
हृदय विशाल कर संवार लेना
बादलों पर घर बना भी लें
आँचल के वन फुहारों को उतार लेना -
चुभ जाए विरह वेदन के शूल
जिस पथ नेह आए बुहार लेना -
विनिमय हाट नहीं कि मोल हो
अधिकार लेना अधिकार देना -

उदय वीर सिंह

सोमवार, 3 जुलाई 2017

कुछ लोग चले जाते हैं तो अच्छा लगता है

कुछ लोग आते हैं तो अच्छा लगता है
कुछ लोग चले जाते हैं तो अच्छा लगता -
कुछ मौन रहते हैं अमन व खुशी के लिए
कुछ आवाज उठाते हैं तो अच्छा लगता है -
कुछ तोड़ लेते हैं रिश्ते झूठी शान में उदय 
कुछ लोग जोड़ लेते हैं नाते अच्छा लगता है -
कुछ लोग शमशान ले जाते हैं कुरीतियों को
कुछ संस्कारों का महल बनाते है अच्छा लगता है
कुछ लोग भूल जाते हैं किए अहसानों को
कुछ लोग ता-उम्र निभाते हैं अच्छा लगता है -
उदय वीर सिंह

रविवार, 2 जुलाई 2017

साधना समृद्ध हो गई है -

कागज पर लिख दी गंगा
कविता शुद्ध हो गई है -
कागज पर लिखा हिमालय
सरिता अवरुद्ध हो गई है -
कागज पर लिखा कठोर 
करुणा निशिद्ध हो गई है -
कोरी कल्पना के प्रतिमान मेरे ऊंचे हुए
चेतना प्रसिद्ध हो गई है -
कागज पर लिखी प्रतिष्ठा
साधना समृद्ध हो गई है -
लिखा G S T के बाबत तो
व्यवस्था क्रुद्ध हो गई है -
उदय वीर सिंह

शनिवार, 17 जून 2017

दरबार भरे हैं वादों से

कौन कहता है कंगाली है खाली है बदहाली है
दरबार भरे  हैं वादों से
आँखों की ज्योति नहीं बदली चश्में सारे बदल रहे
चौबारे.विस्वास  से खाली है,,बाजार भरे उन्मादों से 
बढ़ती  समस्याएँ हनुमान की पुंछ सदिस 
अखबार भरे ,संवादों से 
हासिल है मिश्री मक्खन उनको 
मजलूम मरे.किसान.मरे अवससदों दों से ...

उदय वीर सिंह 


सोमवार, 12 जून 2017

सत्ता के गलियारे कैसे

सत्ता के गलियारे कैसे
जीवन पलड़े पर तोल रहे
संवेदनहीन सरकारें हैं
बोल घृणा के बोल रहे -
कक्ष कोष क्षेत्र रंगों में
मानव विभक्त किया जाता
सुनी राहें न्याय सत्य की
जन दंभ द्वेष में झुलस रहे -
हैं सबके रक्षक सबके पालक
हुए तेरे किसान मेरे जवान
एक राष्ट्र की शीतल बयार में
सत्ता मद विष- घोल रहे -
जीवन सत्ता का खेल नहीं
सृष्टि का अनमोल रतन है
कंचे -कौड़ी के खेल समझ
हार -जीत सम खेल रहे -
सत्ता आज किसी की है
कल और किसी की होगी
जीवन ईश्वर की सत्ता है
जीवन को जीवन रहने दो -

उदय वीर सिंह

रविवार, 21 मई 2017

कुछ संवेदना

मित्रों ! मंगल प्रभात ! आजकल मैं आँखों में मोतियाबिंद व रेटिना में हुए आघात की वजह से सेहत संबंधी समस्याओं से रूबरू हूँ । सो पठन -पाठन न के बराबर है ।
कल घर में कुछ सुभचिंतक व सगे संबन्धियों की उपस्थिती थी, कई लोगों की सहानुभूतु व सुंदर सुझाव मिले अच्छा लगा उनका साधुवाद किया । डाक्टरों ने कुछ कमियाँ कुछ नुख्से बताए उनके अनुसार चिकित्सा चल रही है । लाभ भी है ।
सबके चले जाने के बाद मेरी अर्धांगिनी ने हाथ में चाय का प्याला देते हुए कहा -एक जुरुरी गल है जी !
दसो जी ! कि जुरुरी गल बीमार नालों करनी ए ? मैंने कहा-
बड़ी दीदी [ जेठानी ] जी कह रहीं थी के- त्वानु संवेदना दी लोड हैगी कट [कम] हो गई है । जो सेहत वास्ते बहुत जुरुरी है । लेंणी पाऊँगी ।
मुझे भी पत्नी की बात सुनकर चिंता हो गई । उसकी तरफ देख खामोश सोचता रहा ।
तूसी चिंता न करो जी ! हूण चलते हैं बाजार तों कुझ संवेदना खरीद लइए । कोल पैसे कट हैंगे, थोड़ा ही सही ले लेवांगे, होर बाद विच लावागे । पत्नी ने कहा ।
ठीक आखिया जी । मने हाँ में हाँ मिलाई ।चलो थोड़ा टूरना भी हो जावेगा ,थोड़ी संवेदना भी खरीद लेंगे । मैंने कहा ।
और मित्रों हम दोनों ऐसे तैसे बाजार गए और थोड़ी पैसों के मुताबिक संवेदना अपने स्वास्थ्य की लिए ले कर घर आए हैं । सेवन कर रहे हैं । आपके अवलोकन समीक्षा के लिए संवेदना प्रस्तुत भी कर रहे हैं । विषय संवेदना का है तो आभार तो बनाता है जी ।
****
कुछ संवेदना मैं बाजार से खरीद लाया हूँ
माडल नंगी थी चित्र रंगों से ढक आया हूँ -
बच्चे के इलाज में किडनी वसूल ली वीर
आराम के लिए नींद की गोली दे आया हूँ
शहर में कुछ बदरंग बस्तियाँ रहें क्यों
शहर से बहुत दूर उन्हें कहीं छोड़ आया हूँ -
माँ बाप से प्यार इतना है कि निः शब्द हूँ
मूर्तियाँ घर में उन्हें अनाथालय छोड़ आया हूँ -
पड़ोसी मेरे धर्म का नहीं कितना बड़ा अनर्थ
दीवार कर ऊंची बहुत रिश्ते तोड़ आया हूँ -
मशालों ने गुमराह कर दिया परछाईयों को
हुत दूर कहीं अँधेरों में उन्हें छोड़ आया हूँ -
उदय वीर सिंह

शनिवार, 20 मई 2017

कुछ संवेदना मैं बाजार से खरीद लाया हूँ

कुछ संवेदना मैं बाजार से खरीद लाया हूँ
माडल नंगी थी चित्र रंगों से ढक आया हूँ -
बच्चे के इलाज में किडनी वसूल ली वीर
आराम के लिए नींद की गोली दे आया हूँ
शहर में कुछ बदरंग बस्तियाँ रहें क्यों
शहर से बहुत दूर उन्हें कहीं छोड़ आया हूँ -
माँ बाप से प्यार इतना है कि निः शब्द हूँ
मूर्तियाँ घर में उन्हें अनाथालय छोड़ आया हूँ -
पड़ोसी मेरे धर्म का नहीं कितना बड़ा अनर्थ
दीवार कर ऊंची बहुत रिश्ते तोड़ आया हूँ -
मशालों ने गुमराह कर दिया परछाईयों को
हुत दूर कहीं अँधेरों में उन्हें छोड़ आया हूँ -

उदय वीर सिंह 




रविवार, 14 मई 2017

माँ शब्द नहीं संबल है .....कोटिशः प्रणाम !

माँ शब्द नहीं संबल है .....कोटिशः प्रणाम !
देकर आँचल ओट गगन को रोक लेती है 
नद क्या विपदा के सागर को सोख लेती है 
ग्रन्थों के पन्ने अधूरे कलम बेजान लगती है 
माँ का मुकाम ऊंचा है जन्नत तोड़ लेती है -
वीर खौफजदा रहते हैं तूफानॉ के काफिले
माँ ऐसी दीवार है की रास्ता मोड देती
उदय वीर सिंह

बुधवार, 10 मई 2017

अपना गाँव कहोगे

किस गाँव मजरे को अपना गाँव कहोगे
किस पेड़ की छांव अपनी छांव कहोगे
हर पुरवा हर बिरवा बिरासत है देश की
किस ठाँव को अपनी ठाँव कहोगे -
तरु ने बांटी बयार या सरिता ने नीर कब
कब मानव के घावों को अपना घाव कहोगे
खेत प्रतिष्ठानो सरहदों के पालक हैं
किस पाँव को अपना पाँव कहोगे -

उदय वीर सिंह

शुक्रवार, 5 मई 2017

है ऊंचा साडा देश -

सिर गया साजन गया पगड़ी गई निर्मोह 
नींद गई सपने गए बचपन से आशा मोह 
बेबे की आशीष प्रतीक्षा बापू का नेह सनेह 
लोडी बैसाखी आएंगी अब  न आएगा गेह -
खाली आँचल मांग धुली वो टूर गया दे संदेश 
राह  न सुनी हो वलिदानी है ऊंचा साडा देश -
उदय वीर सिंह 

बुधवार, 3 मई 2017

छोड़िए बहुत जुमले हुए

छोड़िए बहुत जुमले हुए हकीकत पे आइए
सियासत में बेहयाई है शहादत पे आइए -
दावतें होती रहेंगी उम्र भर अदावत पे आइये
दरो दीवार नंगी हो रही हिफाजत पे आइए -
दुर्दशा देखिये घर में किसान सरहद पे जवानों की 
अब खुद से करिए सवाल बगावत पे आइए -
वे फिदा हुए वतन पर कटा सिर रुखसत हुए
पीछे विधवा बीबी मासूमों की तड़फड़ाहट पे आइए -
उदय वीर सिंह

सोमवार, 1 मई 2017

समझो दिन बहुरे -

अभिव्यक्तियों की मचान पर गूंगे बैठ जाएँ
समझो दिन बहुरे
बहरों की बस्तियों में अजान हो जाए
समझो दिन बहुरे
भगवनों के बाजार में कहीं भक्त मिल जाए
समझो दिन बहुरे
गौड़ हो गया है मजहबों में इंसान मिल जाए
समझो दिन बहुरे -

उदय वीर सिंह

रविवार, 30 अप्रैल 2017

मैं न जाना मधु मधुशाला

जब  सिर पर पगड़ी नहीं 
ऊछालोगे क्या लंबरदार
सिर ऊपर मेरे छत नहीं 
निकालोगे क्या लंबरदार-
मैं न जाना मद..मधुशाला 
संभालोगे क्या लंबरदार-
मेरी मिर्जई जेब नहीं 
खंघालोगे क्या लंबरदार -
नीर छीर के आयत को 
ढालोगे क्या लंबरदार
मर जाएगा सिंह बंधन में
क्या पालोगे लंबरदार -
उदय वीर सिंह 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

मानविंदु समर्थ योगी

जिसने योगी को समझा है
उसने जीवन को समझा है
वेदन क्या ,आँसू क्या होता है
उसने मानस मन को समझा है -
वैराग्य समर्थ का स्पंदन है
अनबोलों का क्रंदन समझा है
वनवासी वनजीवों का मीत
अभिनंदन कर वंदन समझा है -
नारी अबला का मान विंदु
मर्यादा का मर्दन समझा है -
ज्योति नयन हंसी अधरों को
बेकस का अतिरंजन समझा है -
दम तोड़ती आशाओं का
अपेक्षाओं का सुंदरतम समझा है
जनमानस को ताबेदार समझती
तानाशाही का अन्तर्मन समझा है -
उदय वीर सिंह